इलाहाबादी होना खुद के लिए गुरुर का विषय हो सकता है ! हो भी क्यों न ? भाई इलाहाबाद है ही ऐसा ! विशाल संगम को समेटे अपने गोदी में ले जाता है दूर कि जैसे संगम पर आने वाले पक्षी भी होना चाहते है इलाहाबादी ।
नाव के किनारों पर मंडराते वो साइबेरियाई पंछी कह रहे हो कि कोई तो आईडी डाल दो हमारे भी गले की हम होना चाहते है इलाहाबादी ।
यूँ तो बड़े बड़े शहरों और मल्टी कॉम्पलेक्स बिल्डिंग्स ने सुकून छीन सा लिया है कि इलाहाबाद अब भी जस का तस ही है । यहाँ Escalator सी नही चलती जिंदगी , यहाँ तो रिक्शों के पहियों सी चलती है जिंदगी सुस्ता सुस्ता कर , इसलिए तो रुडयार्ड किपलिंग ने इलाहाबाद को सोता हुआ शहर कहा है । बड़े बड़े महानगरों में रहने वालों को इलाहाबाद का जीवन कत्तई रास नही आएगा कि यहां की शामें बोलती सी है और सुबह की लाली खिल आती है किसी शोख़ मुस्कान की तरह गंगा किनारे।
शाम - ए - इलाहाबाद देखना हो तो कभी किला घाट पर घूमना परदेशियों के लिए बढ़िया विकल्प हो सकता है ।
यहाँ से सूरज ढल कर सीधा अपनी मईया की गोदी में जाता हुआ लगता है कि शफ़क़ (सूरज की लालिमा) उतर आती है गंगा के प्रावाह में । उगती हुई सुबह यहाँ की सबसे खूबसूरत सुबहों में से एक होती है कि बीच संगम में से देखते ही बनती है सूरज की वो नारंगी किरणें ।
जलेबी यूपी की राष्ट्रीय मिठाई बाद में होगी पहले इलाहाबाद की है कि दही जलेबी से दिन के चक्के चलते है यहाँ । मंदिरों के मोहल्ले दारागंज की सड़कों पर घण्टे की धुन किसी दूसरे छोर तक सुनाई देती है । संगम का प्रशांत परिवेश हर सुख को लपेटे हुए है खुद में कि मन शांत हो जाता है वहाँ पहुँचकर कि हनुमान जी की कृपा है इस शहर पर ।
विश्वविद्यालय के आसपास के मोहल्ले में आप सुबह सुबह अगर गलती से पहुँच भी जाते है तो आपको लगेगा कि कहीं चाय वाली गली में तो नही आ गए ? छात्रावासी जीवन में इलाहाबादी छात्रों के लिए चाय ड्रग्स जैसी ही है । अलसायी सी सुबह में लगभग आधा दर्जन लोग आपको एक ही टपरी पर चाय पीते मिल जाएंगे ।
सखी - सहेलियां सिविल लाइन्स की चौड़ी सड़कों पर आपको पूरा रास्ता छेक कर चलती हुई मिल जाएंगी कि ये इलाहाबाद की सबसे बड़ी उपलब्धि है । विस्तृत भूखण्ड और बड़े बड़े बगीचों, अंग्रेजों के जमाने की बनी चौड़ी चौड़ी क्यारियों में लगे हर रंग के फूलों से गुलज़ार राजकीय उद्यान इलाहाबाद की जान है ।
मोक्ष सेतु यानि नैनी और इलाहाबाद को जोड़ने वाला दूसरा पुल । मोक्ष सेतु इस नाम से केवल मेरे विभाग के ही लोग बुलाते है इसे कि विश्वविद्यालय के दिनों में किसी एक प्रोफेसर ने नामकरण किया था । यूँ तो सोचती नही हूँ पर ख्याल आता है कि कहीं यहाँ से कूदे लोग सचमुच मोक्ष तो न पा जाते है ? अगर हाँ ?तो एकात बार हम आप भी ट्राइ करें का ?
इलाहाबादी भाषा का पूरी दुनिया में जलवा है । कसम से! हर चौराहे पर आपको लोग मिल जाएंगे बैकैती करते हुए । बैंक रोड और यूनिवर्सिटी रोड जो कि मेरी सबसे पसन्दीदा जगहों में से एक है कि यहाँ सावन , बसन्त , फाग ,और सर्दियाँ सब दिन एक समान होते है ।
लोकनाथ की लस्सी , कल्लू कचौड़ी , नेतराम की कुल्फी, बालसन की आइसक्रीम , देहाती रसगुल्ला , बहादुरगंज की नमकीन और गऊघाट के दोहरे हर चीज से सुलभ है इलाहाबाद।
कटरा , चौक की बार्गेनिंग और पैंटालून की आउटस्टेंडिंग हर तरह के लोग है यहाँ । जंक्शन पर खड़े अपनी रेलगाड़ी का इंतजार करते लोग , प्रयाग पर खड़े चाय का घूंट लेते खलिहर लोग , कैम्पस में बैकैती झाड़ते सीनियर लोग , अंग्रेजी मे खिट - पिट करते संगम किनारे विदेशी लोग , सड़क किनारे बैठे बेरोजगार ज्योतिषी लोग , उलूल जुलूल टोने टोटके बताते मंदिर के बाहर साधु लोग , सीनियर से बच के निकलते गर्लफ्रेंड के साथ जूनियर लोग , क्लास में पढ़ाने से जी चुराते प्रोफेसर लोग , प्रोफेसर के पीछे चलते उनके चमचे लोग ।
शहर छोटा है पर लोग दिल के बड़े है । यहाँ प्रेम है , अपनापन है किसी अनजान शहर से लोगों का 8/8 के सलोरी , बघाड़ा , कटरा और छात्रावास के कमरों में दिल से स्वागत करता है इलाहाबाद। गली , मोहल्ले सब किसी गाँव की टोले जैसे है यहाँ। ये शहर शांत है। बेबाक है मेरा शहर।
: Shweta Mishra ✍

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