प्रयागराज क्यों और कैसे ?


प्रयागराज की गणना भारत में ही नहीं अपितु विश्व के प्राचीनतम तीर्थ स्थलों में की जाती है। इस स्थल की महिमा से संबंधित प्राचीनतम उल्लेख ऋग्वेद के दसवें मंडल की एक रिचा में उल्लेख मिलता है जहां श्वेत एवं श्याम वर्ण की 2 नदियों का संगम स्थल है वहां जो मनुष्य स्नान करते हैं वें पवित्र होकर स्वर्ग को प्राप्त करते हैं और जो उस संगम स्थल में देहोत्सर्ग करते हैं वह सांसारिक आवागमन के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष के भागी होते हैं।
महाभारत के आदि पर्व में प्रयाग तीर्थ को सोम, वरुण और प्रजापति की जन्म भूमि कहा गया है तथा वन पर्व में पुलस्त्य तथा धौम्य ऋषि की तीर्थ  यात्रा के प्रसंग में उल्लेख किया गया है कि प्रयागराज में सभी तीर्थ तीर्थों देवगडों तथा ऋषि मुनियों का निवास है। यहां पर बड़े-बड़े देवगडों तथा महात्माओं ने यज्ञ किया है। पितामह ब्रह्माजी ने भी यहां पर दस यज्ञ किया था इसलिए इसे प्रयाग की संज्ञा दी गई इस प्रकार तपोभूमि प्रयाग सब तीर्थों में श्रेष्ठ है।
अनुशासन पर्व में कहा गया है कि माघ महीने में तीन करोड़ 10000 तीर्थ प्रयाग में एकत्र होते हैं। उस समय संशित व्रत होकर प्रयाग में स्नान करने से मनुष्य निष्पाप होकर स्वर्ग लोक का अधिकारी बन जाता है।
प्रयाग शब्द की निष्पत्ति यज् धातु से मानी गई है। प्र उपसर्ग का प्राकृतिक एवं श्रेष्ठ से तात्पर्य है याग शब्द यज्ञ वाची है।इस संज्ञा के निर्वाचन के विषय में महाभारत के पूर्वोत्क  विचार का समर्थन अन्य ग्रंथों से भी होता है। जिससे प्रयाग की यज्ञ संबंधी अटूट परंपरा का स्पष्टीकरण हो जाता है। ब्रह्म पुराण के अनुसार इस तीर्थ में प्रकृष्ट यज्ञ हुए हैं इसलिए इसे प्रयाग कहते हैं और यज्ञ स्थलों में प्रधानता के कारण इसे प्रयागराज भी कहा जाता है। जिससे यज्ञ और यज्ञ फल प्रकट होते हैं उसे अथवा यज्ञों की श्रेष्ठता जहां हो उसे प्रयाग कहते हैं।


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