मॉब लिंचिंग : आंतरिक सुरक्षा


माब लिचिंग : आंतरिक सुरक्षा : भारतीय समाज और  राज्य व्यवस्था : GS paper - । & ।।
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1.चर्चा में क्यों
2.क्या है भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा (Mob Lynching) ?
3.पालघर की घटना
4. क्यों होती हैं ये घटनाएँ / लिंचिंग के कारण / भीड़ द्वारा हत्या का कारण
5.माबलिचिंग से संबंधित कानूनी प्रावधान
6.क्यों है नए कानून की आवश्यकता
7.भीड़ द्वारा हत्या क्यों रूकनी चाहिए
8.सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश
9.राज्य सरकारों के कानून
10.माब़ लिचिंग का प्रभाव
11.भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा को रोकने के उपाय
12.सुझाव
13.निष्कर्ष

चर्चा में क्यों ?
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 महाराष्ट्र के पालघर जिले में भीड़ द्वारा तीन संतों की कथित तौर पर हत्या कर दी गई।

क्या है भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा (Mob Lynching) ?
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जब अनियंत्रित भीड़ द्वारा किसी दोषी को उसके किये अपराध के लिये या कभी-कभी अफवाहों के आधार पर बिना अपराध किये भी उसी समय सज़ा दी जाए अथवा उसे पीट-पीट कर मार डाला जाए तो इसे भीड़ द्वारा की गई हिंसा (Mob Lynching) कहते हैं। इस तरह भीड़ द्वारा की गई हिंसा में हमेशा एक संदेश निहित होता है जो भीड़ द्वारा समाज में प्रेषित किया जाता है। इस तरह की हिंसा में किसी कानूनी प्रक्रिया या सिद्धांत का पालन नहीं किया जाता।

पालघर की घटना
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यह घटना 16 अप्रैल की रात को हुई जब कांदिवली के एक आश्रम में रहने वाले दो तपस्वियों, 70 वर्षीय महंत कल्पवृक्ष गिरी और 35 वर्षीय सुशीलगिरी महाराज ने सूरत में एक अंतिम संस्कार में शामिल होने का निर्णय किया। इसके पश्चात दोनों ने कांदिवली से सूरत तक यात्रा करने के लिए नीलेश येलगड़े  द्वारा संचालित एक कार किराए पर ली और अपनी यात्रा को लॉक डाउन में प्रशासन द्वारा रोकने से बचने के प्रयास में, तीनों ने मुंबई - गुजरात राजमार्ग का उपयोग करने के बजाय गुजरात में प्रवेश करने के लिए पालघर जिले की पिछली सड़कों से जा रहे थे।उनके वाहन को वन विभाग के एक संतरी ने महाराष्ट्र और दादरा एवं नागर हवेली की सीमा पर स्थित गढचिचले गांव के पास रोक लिया। हालांकि क्षेत्र में पिछले कुछ दिनों से रात में फसल काटने एवं बच्चा चुराने वाले गिरोह सक्रिय होने की अफवाह फैलीं हुई थी जब वे संतरी के साथ बात कर रहे थे तभी पालघर के दूरदराज के एक आदिवासी गांव गढचिंचल में ग्रामीणों के एक समूह ने उनकी कार को रोका और उन पर पत्थर और कुल्हाड़ियों से हमला कर दिया।

क्यों होती हैं ये घटनाएँ /  माब़ लिंचिंग के कारण / भीड़ द्वारा हत्या के कारण
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1.नृजातीय- सांस्कृतिक तनाव
2.असमानता
3.कानून की कमी
4.आपराधिक अष्पस्ट्ता
5.फेक न्यूज़ व सोशल मीडिया

भारत में धर्म और जाति के नाम पर होने वाली हिंसा की जड़ें काफी मज़बूत हैं। वर्तमान में लगातार बढ़ रहीं लिंचिंग की घटनाएँ अधिकांशतः असहिष्णुता और अन्य धर्म तथा जाति के प्रति घृणा का परिणाम है।

जैसे वर्ष 2002 में हरियाणा के पाँच दलितों की गौ हत्या के आरोप में लिंचिंग कर दी गई थी। वहीं सितंबर 2015 में एक अज्ञात समूह ने मोहम्मद अखलाक और उनके बेटे दानिश पर गाय की हत्या करने और मांस का भंडारण करने का आरोप लगाते हुए पीट-पीट कर उनकी हत्या कर दी थी।

इन घटनाओं से मॉब लिंचिंग में धर्म और जाति का दृष्टिकोण स्पष्ट तौर पर ज़ाहिर होता है।

 देश में बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समुदाय के बीच अविश्वास की एक गहरी खाई है जो कि हमेशा एक-दूसरे को संशय की दृष्टि से देखने के लिये उकसाती है और मौका मिलने पर वे एक-दूसरे से बदला लेने के लिये भीड़ का इस्तेमाल करते हैं।

आधुनिकता के साथ ही हमारे अंदर व्यक्तिवाद की भावना का विकास हुआ है और हमारे सामाजिक जुड़ाव में कमी आई है, जिसके कारण हम विविधता की सराहना करना भूल गए हैं।

अक्सर यह कहा जाता है कि ‘भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता’ और शायद इसी कारण से भीड़ में मौजूद लोग सही और गलत के बीच फर्क नहीं करते हैं।

लिंचिंग में संलिप्त लोगों की गिरफ्तारी न होना देश में एक बड़ी समस्या है। यह न केवल पुलिस व्यवस्था की नाकामी को उजागर करता है, बल्कि अपराधियों को प्रोत्साहन देने का कार्य भी करता है।

समाज में व्याप्त गुस्सा भी इसमें एक उत्प्रेरक का कार्य करता है, चाहे वह गुस्सा किसी भी रूप में हो; यह गुस्सा शासन व्यवस्था, न्याय व्यवस्था या सुरक्षा को लेकर भी हो सकता है जो कि अंततः उन्मादी भीड़ के रूप में बाहर आता है।

भारत में जनप्रतिधियों के नैतिक आचरण को नियंत्रित करने को लेकर कोई विशेष प्रावधान नहीं हैं, जिसके कारण भारत में निजी हमले तथा अपमानजनक और नफरत फैलाने वाले भाषण काफी सामान्य हो गए हैं और ये भाषण भी मॉब लिंचिंग में बड़ी भूमिका अदा करते हैं।

राजनीति भी हिंसात्मक भीड़ का प्रमुख कारण होती है, कभी वोट बैंक के लिये प्रायोजित हिंसा या कभी धर्म के नाम पर करवाई गई हिंसा, राजनीतिक दलों को राजनीति के लिये एक विस्तृत पृष्ठभूमि प्रदान करती है।

माबलिचिंग से संबंधित कानूनी प्रावधान
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भारतीय दंड संहिता में लिंचिंग जैसी घटनाओं के विरुद्ध कार्रवाई को लेकर किसी तरह का स्पष्ट उल्लेख नहीं है और इन्हें धारा- 302 (हत्या), 307 (हत्या का प्रयास), 323 (जानबूझकर घायल करना), 147-148 (दंगा-फसाद), 149 (आज्ञा के विरूद्ध इकट्ठे होना) तथा धारा- 34 (सामान्य आशय) के तहत ही निपटाया जाता है।

भीड़ द्वारा किसी की हत्या किये जाने पर आईपीसी की धारा 302 और 149 को मिलाकर पढ़ा जाता है और इसी तरह भीड़ द्वारा किसी की हत्या का प्रयास करने पर धारा 307 और 149 को मिलाकर पढ़ा जाता है तथा इसी के तहत कार्यवाही की जाती है।

आपराधिक दंड संहिता की धारा 223A में भी इस तरह के अपराध के लिये उपयुक्त क़ानून के इस्तेमाल की बात कही गई है, सीआरपीसी में भी स्पष्ट रूप से इसके बारे में कुछ नहीं कहा गया है।

भीड़ द्वारा की गई हिंसा की प्रकृति और उत्प्रेरण सामान्य हत्या से अलग होते हैं इसके बावजूद भारत में इसके लिये अलग से कोई कानून मौजूद नहीं है।

क्यों है नए कानून की आवश्यकता ?
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देश में कानून तो पर्याप्त हैं, लेकिन उन कानूनों का ईमानदारी पूर्वक पालन न करने से अपराधों में वृद्धि देखी गई है।

कानूनों का क्रियान्वयन उचित ढंग से नहीं किया जा रहा है। कानून का क्रियान्वयन करने की ज़िम्मेदारी व्यवस्थापिका की होती है लेकिन कार्यकारी स्तर पर ही लचरता के कारण इसमें अपेक्षित परिणाम नहीं प्राप्त होता है।

राजनैतिक हस्तक्षेप और अपराधियों को महिमामंडित करने की वर्तमान प्रवृत्ति के कारण इस तरह की घटनाओं में शामिल लोगों का मनोबल बढ़ता है, अतः नए कानून के आने से इन घटनाओं में शामिल लोगों के मन में कानून के डर को स्थापित किया जा सकेगा।

कानूनों को लागू करने वाले तंत्र में अपेक्षित समर्पण और व्यावसायिक दक्षता की कमी है। पहले अपराधियों को इस हद तक लाचार कर दिया जाता था की वे दोबारा अपराध के लिये साहस नहीं जुटा पाते थे लेकिन अब प्रशासनिक महकमे में यह कूवत नहीं दिखती।

वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों और समय के हिसाब से भी विद्यमान कानूनों में संशोधन या नए कानूनों की आवश्यकता दिखती है।

भीड़ द्वारा हत्या क्यों रुकनी चाहिए 
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1.गैर न्यायिक हत्या
2.सामाजिक समरसता के विरुद्ध
3.अराजकता
4.लोकतांत्रिक सिद्धांतों के विरुद्ध

नोट - भीड़ द्वारा हत्या ,गैर न्यायिक हत्या होती है जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 तथा भारतीय कानूनी प्रक्रिया के विरुद्ध है।

सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश
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राज्य सरकारें प्रत्येक ज़िले में मॉब लिंचिंग और हिंसा को रोकने के उपायों के लिये एक सीनियर पुलिस अधिकारी को प्राधिकृत करेंगी।
राज्य सरकारें शीघ्रता से उन ज़िलों, उप-ज़िलों, गाँवों की पहचान करेंगी जहाँ हाल ही में मॉब लिंचिंग की घटनाएँ हुई हैं।
नोडल अधिकारी मॉब लिंचिंग से संबंधित अंतर ज़िला स्तरीय मुद्दों को राज्य के DGP के समक्ष प्रस्तुत करेगा।
केंद्र तथा राज्य सरकारों को रेडियो, टेलीविज़न और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यह प्रसारित कराना होगा कि किसी भी प्रकार की मॉब लिंचिंग एवं हिंसा की घटना में शामिल होने पर विधि के अनुसार कठोर दंड दिया जा सकता है।

विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसारित ऐसे गैर-ज़िम्मेदार और भड़काऊ संदेशों तथा अन्य सामग्री पर प्रतिबंध लगाना चाहिये जिनसे समाज में मॉब लिंचिंग जैसी घटनाएँ घटित होती हैं।

ऐसे संदेश फैलाने वालों पर उचित प्रावधान के अंतर्गत FIR दर्ज करनी चाहिये।राज्य सरकारें मॉब लिंचिंग से प्रभावित व्यक्तियों के लिये क्षतिपूर्ति योजना प्रारंभ करेगी।
  राज्य सरकारें यह सुनिश्चित करेंगी कि पीड़ित के परिवार के किसी भी व्यक्ति का पुनः उत्पीड़न न हो।

राज्य सरकारों के कानून
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सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गए दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए सर्वप्रथम मणिपुर ने वर्ष 2018 में ही लिंचिंग के विरुद्ध प्रस्ताव पारित किया था। मणिपुर के लिंचिंग विरोधी विधेयक में निम्नलिखित बिंदु शामिल थे-

1. लिंचिंग जैसे अपराधों को रोकने के लिये प्रत्येक ज़िले में एक नोडल अधिकारी की नियुक्ति हो।

2.अपने क्षेत्राधिकार में लिंचिंग के अपराध को रोकने में विफल रहने वाले पुलिस अधिकारियों के लिये जुर्माने तथा कैद की सज़ा का प्रावधान भी किया गया है।

3.लिंचिंग संबंधी अपराधों पर मुकदमा चलाने के लिये राज्य सरकारों की अनुमति भी नहीं लेनी होगी।

4. पीड़ितों या उनके निकट परिजनों को पर्याप्त मौद्रिक मुआवज़ा ।

जिसके पश्चात् राजस्थान सरकार ने भी अगस्त 2019 में लिंचिंग विरुद्ध के विधेयक पारित किया। उल्लेखनीय है कि इसी दौरान संसदीय कार्य मंत्री द्वारा सदन में प्रस्तुत किये गए आँकड़ों से यह बात सामने आई थी कि वर्ष 2014 के बाद देश में घटित लिंचिंग घटनाओं में से 78 प्रतिशत घटनाएँ राजस्थान में हुई थीं।

हालांकि राजस्थान सरकार के लिंचिंग विरोधी विधेयक  में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गए कई दिशा-निर्देशों की अनदेखी की गई है, क्योंकि यह विधेयक लिंचिंग की घटनाओं को रोकने में विफल रहने वाले अधिकारियों के संबंध में कोई प्रावधान नहीं करता।

राजस्थान के बाद पश्चिम बंगाल ने भी लिंचिंग को रोकने के लिये एक विधेयक पारित किया। पश्चिम बंगाल के विधेयक में किसी व्यक्ति को घायल करने वालों को तीन साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा का प्रावधान है और यदि लिंचिंग से किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो मृत्युदंड या कठोर आजीवन कारावास का प्रावधान भी है।

मणिपुर, राजस्थान और पश्चिम बंगाल के अतिरिक्त अब तक अन्य किसी भी राज्य ने इस संबंध में कोई कार्रवाई नहीं की है।

प्रभाव
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यह घटनाएँ पूर्णतः गैर-कानूनी और संविधान में निहित मूल्यों के विरुद्ध होती हैं। ऐसे में यदि इन पर रोक नहीं लगाई जाती है तो आम जनता का संविधान और न्यायपालिका से विश्वास उठ जाएगा।

हालांकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद-21 में प्रत्येक व्यक्ति को जीवन जीने का अधिकार दिया गया है। मॉब लिंचिंग से व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन होता है।
साथ ही राज्य की कानून व्यवस्था पर भी सवालिया निशान लगता है। ग्लोबल पीस इंडेक्स 2019 में भारत 163 देशों में से 141वें स्थान पर था।

यह समाज की एकजुटता और विविधता में एकता के विचार को प्रभावित करता है और आम लोगों के मध्य असंतोष तथा अशांति की भावना को जन्म देता है। इससे समाज में बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक का माहौल पैदा होता है और जाति, वर्ग तथा सांप्रदायिक घृणा को बढ़ावा मिलता है।

यह विदेशी और घरेलू निवेश दोनों को प्रभावित करता है और इससे हमारी अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान होता है। कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने भारत को भीड़ द्वारा की जाने वाली घटनाओं के खिलाफ चेतावनी दी है।

इससे आंतरिक प्रवास को बढ़ावा मिलता है और अर्थव्यवस्था प्रतिकूल रूप से प्रभावित होती है।
इस प्रकार की घटनाओं को रोकने के लिये सार्वजनिक संसाधनों की भी काफी अधिक बर्बादी होती है।

भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा को रोकने के उपाय
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कानूनों का निष्ठापूर्वक पालन किया जाना चाहिये, इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिये शुरुआती कदम उठाते हुए त्वरित कार्यवाही की जानी चाहिये।

अपराधियों को राजनैतिक प्रश्रय न प्रदान करते हुए उनके लिये सख्त-से-सख्त सज़ा सुनिश्चित की जानी चाहिये।
हर परिस्थिति में निवारक उपायों का क्रियान्वयन संभव नहीं है, अतः पुलिस को ऐसी स्थिति में उचित कदम उठाने की अनुमति दी जानी चाहिये।

पुलिस बलों का तकनीकी और कौशल उन्नयन किया जाना चाहिये, साथ ही पुलिस बलों की संख्या में वृद्धि भी की जानी चाहिये।

विशेषज्ञ कानूनविदों की व्यवस्था की जानी चाहिये ताकि अपराधी कानून की कमियों का फायदा उठाते हुए बच न निकलें।

इस तरह की घटनाओं में सोशल मीडिया द्वारा फैलाई गई अफवाहों का सर्वाधिक योगदान होता है जो भीड़ को एकत्रित करने में बड़ी भूमिका अदा करती है, अतः इन पर लगाम लगाने की सख्त आवश्यकता है।

सुझाव
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अभी तक आम हत्या और भीड़ द्वारा की गई हत्या को कानून के दृष्टि से एक ही माना जाता है, इन दोनों को कानूनन अलग-अलग परिभाषित करना होगा।

भीड़ द्वारा की गई हत्या की पहचान करनी होगी और फिर उसके बाद उस पर दहेज रोकथाम अधिनियम और पॉस्को की तरह एक सख्त और असरदायक कानून बनाना पड़ेगा।

सोशल मीडिया और इंटरनेट के प्रसार से भारत में अफवाहों के प्रसार में तेज़ी देखी गई है जिससे समस्या और भी गंभीर हो गई है। एक रिसर्च के मुताबिक, 40 फीसदी पढ़े-लिखे युवा भी खबर की सच्चाई को नहीं परखते और उसे अग्रसारित कर देते हैं, इस संदर्भ में व्यापक जागरूकता की आवश्यकता है।

निष्कर्ष
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हाल-फिलहाल के दिनों में उन्मादी भीड़ द्वारा एक के बाद एक कई इंसानों की जान ले ली गई। यह एक ऐसा तंत्र है जिसकी न तो कोई विचारधारा है और न ही कोई सरोकार।  भीड़ कहीं भी किसी भी बात पर आक्रामक हो जाती है और जिस किसी से भी इसको नफरत या घृणा होती है उसे उसी वक्त सज़ा देने का फैसला कर देती है। इन घटनाओं में बढ़ोतरी होने की वज़ह लोगों के मन में बसा गुस्सा है। वह गुस्सा किस बात पर है यह मायने नहीं रखता। लोग गुस्से में हैं, नाराज़ हैं और हताश हैं लेकिन उन्हें खुद पता नहीं है कि ऐसा क्यों है। इसे कानून व्यवस्था की समस्या के तौर पर ही नहीं बल्कि समाज में बनी विसंगतियों के समाधान द्वारा ही सुलझाया जा सकता है।


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