प्लेटो का ईश्वर संबंधी विचार

 प्लेटो धर्मात्मा और ईश्वर परायण दार्शनिक थे। ईश्वर सेवा करने के अधिकारी पद को आप संसार में सबसे बड़ा पद समझते थे। प्लेटो ने बताया है कि अच्छे व्यक्ति के लिए सबसे अधिक शानदार महत्वपूर्ण शुभ और मानव आनंद प्राप्ति हेतु ईश्वर आराधना और उसी से प्रार्थना करना ईश्वर नित्य और परिवर्तनशील है बताया गया है कि ईश्वर सरलतम परम तत्व है और मनसा वाचा कर्मणा सत्य है और किसी को वह स्वप्न तक में भी नहीं चलता थीटेटस में कहा गया है कि ईश्वर में अधर्म की छाया तक नहीं है उसमें अशुभ का नाम तक नहीं है। ईश्वर सभी प्रकार के शुभ का स्रोत स्थान है और सब का पोशाक और आनंद दाता है दूसरे शब्दों में प्लेटो का ईश्वर संपूर्णता संपूर्ण तरह शुभ और नैतिक है।

प्लेटो ने ईश्वर को सृष्टिकर्ता माना है और रिपब्लिक में कहा है कि गर्त में से चार तत्व अग्नि, जल ,पावक और पवन के आधार पर ईश्वर ने विश्व की व्यवस्था की है। विश्व की रचना के साथ उसने काल की भी रचना की है। इस रूप में ईश्वर को शिल्पकार कहा जा सकता है क्योंकि पूर्व स्थापित पदार्थ के आधार पर ईश्वर ने विश्व की व्यवस्था की है परंतु सच्चे अर्थ में सृष्टिकर्ता वही है जो स्वयं सामग्रियों को उत्पन्न कर उन्हें व्यवस्थित करता है।

जब ईश्वर स्वयं अपने में पूर्ण हैं और जिसमें किसी भी वस्तु की आकांक्षा नहीं होती तो उसने विश्व की रचना क्यों की?  प्लेटो के शब्द मार्मिक हैं। प्लेटो के अनुसार ईश्वर शुभ है और शुभ से अनु प्रेरित होकर उसने रचना की है की सभी वस्तुएं शुभ ही हो और इनमें किसी प्रकार की बुराई ना हो। फिर ऐसा भी प्रतीत होता है कि प्लेटो ने यह भी कहा है कि ईश्वर के शुभत्व में सहभागी होने के उद्देश्य से ईश्वर ने मानव की रचना की है। तब अशुभ क्यों?

प्लेटो ने कहा है कि विश्व को पूर्व स्थापित मैटर से रचा गया है और मैटर पूर्णतया शुभ के द्वारा शुभ नहीं किया जा सकता है इसमें असत्य का अंश रहेगा ही। द्वितीय ईश्वर में किसी प्रकार की बुराई नहीं है। पर यह सत्य है कि बुराई कभी भी आप मूल रूप से हटाई नहीं जा सकती है। यह इसलिए है कि अच्छे व्यक्ति इस संसार से विरक्त होकर ईश्वर को प्राप्त करें। फिर यह भी ध्वनित होता है कि प्लेटो के अनुसार मानव की अज्ञानता और उसका अन्याय पूर्ण आचरण ही अशुभ का कारण है।

   प्लेटो का ईश्वर के अस्तित्व का प्रमाण -  

यहां प्रश्न उठता है कि इस विश्व के रचयिता के अस्तित्व का क्या प्रमाण हो सकता है? क्या विश्व अपने आप आकाश मिक रीति से उत्पन्न नहीं हो सकता है? फिर यदि विश्व अपने आप ना हुआ हो तो क्या वह वैज्ञानिक के समान यह नहीं कहा जा सकता की यांत्रिक नियमों के अनुसार संसार की पूर्ण व्यवस्था प्राप्त हुई है? प्लेटो ने बुद्धिमान परमेश्वर के अस्तित्व का प्रमाण उपस्थित किया है सर्वप्रथम उद्देश्य मूलक प्रमाण का उल्लेख किया है।
नक्षत्रों के अनुक्रमांक गति से सिद्ध होता है कि इस विश्व का कोई रचयिता है। फिर पृथ्वी सूर्य नक्षत्र और सभी वस्तुओं की व्यवस्था देखी जाए क्या सुचारू तथा आश्चर्यजनक रीति से सभी रत्नों की मां और वर्षों के संचालन की व्यवस्था अपने आप ही हुई है?
द्वितीय, प्लेटो ने एक प्रकार की विश्व कारण युक्ति भी प्रस्तुत की है। संसार की गति ऐसी है कि एक से दूसरे पदार्थ में गति उत्पन्न होती है। परंतु किसी पर निर्भर गति कभी भी समाप्त हो सकती है। इसलिए इसके आधार में स्वता संचालक अस्तित्व अवश्य होगा जो सभी वस्तुओं को संचालित करता हुआ अपने में सुता संचालित बना रहे।
फिर एक समतामूलक प्रमाण की भी ध्वनि  Plato की रचना में मिलती है। वास्तव में अंचल का सत्ता मुल्क युक्ति प्लेटो के प्रत्यय वाद पर आधारित है। परंतु प्लेटो के अनुसार ईश्वर प्रत्यय का एहसास रूप ही है कि इसे नित्य और आमरण सेल समझा जाएगा।
अपितु प्लेटो ने एक प्रकार का प्रमाण दिया है जिसे लोग संप्रति पत्ती के नाम से पुकारा जाता है प्लेटो ने लिखा है कि समस्त मानव जाति यूनानी और गैर यूनानी देवताओं में विश्वास रखते हैं ऐसा उल्लेख उसने अपनी पुस्तक लाज में किया है।

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